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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 239
विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् । अमित्रादपि सद्वृत्तममेध्यादपि काञ्चनम् ॥
विष से भी लिया जा सकता है अमृत, बालक से भी सद्बुद्धि; शत्रु से भी अच्छा आचरण सीखा जा सकता है; और सोना अशुद्ध स्रोत से भी लिया जा सकता है।
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