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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 23
कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः । स ज्ञेयो यज्ञियो देशो म्लेच्छदेशस्त्वतः परः ॥
लेकिन जिस क्षेत्र में चित्तीदार मृग स्वभाव से विचरण करते हैं, उसे 'यज्ञों के योग्य भूमि' के रूप में जाना जाता है, इसके आगे 'म्लेच्छों की भूमि' है।
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