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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 222
आचम्य प्रयतो नित्यमुभे सन्ध्ये समाहितः । शुचौ देशे जपञ्जप्यमुपासीत यथाविधि ॥
जल का घूंट घूंट-घूंट कर शांत चित्त से नित्य स्वच्छ स्थान पर नियमानुसार मंत्रों का जाप करते हुए दोनों संध्याओं का ध्यान करना चाहिए।
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