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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 218
यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति । तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥
जैसे कुदाल से खोदने वाले को पानी मिल जाता है, वैसे ही जो सेवा करने में तत्पर रहता है, वह उस विद्या को प्राप्त कर लेता है, जो गुरु में होती है।
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