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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 214
अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुनः । प्रमदा ह्युत्पथं नेतुं कामक्रोधवशानुगम् ॥
क्योंकि स्त्रियां इस संसार में मूर्ख को ही नहीं, ज्ञानी को भी भटका सकती हैं, और उसे काम और क्रोध की दासी बना सकती हैं।
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