उत्सादनं च गात्राणां स्नापनौच्छिष्टभोजने ।
न कुर्याद् गुरुपुत्रस्य पादयोश्चावनेजनम् ॥
एक शिष्य को अपने गुरु के पुत्र के अंगों को शैंपू नहीं करना चाहिए, न ही उसे नहलाने में सहायता करनी चाहिए, न ही उसके भोजन के टुकड़े खाने चाहिए और न ही उसके पैर धोने चाहिए।
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