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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 205
गुरोर्गुरौ सन्निहिते गुरुवद् वृत्तिमाचरेत् । न चानिसृष्टो गुरुणा स्वान् गुरूनभिवादयेत् ॥
यदि उसके गुरु का गुरु निकट हो तो उसके साथ वैसा ही व्यवहार करे जैसा अपने गुरु के प्रति; परन्तु जब तक गुरु की आज्ञा न हो, वह अपने कुल के पूज्य व्यक्तियों को नमस्कार न करे।
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