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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 203
प्रतिवातेऽनुवाते च नासीत गुरुणा सह । असंश्रवे चैव गुरोर्न किं चिदपि कीर्तयेत् ॥
उसे अपने गुरु के पास, अनुवात की ओर या उसके पवन की ओर न बैठने दें और न वह ऐसा कुछ कहे जो उसके गुरू न सुन सकें।
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