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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 184
गुरोः कुले न भिक्षेत न ज्ञातिकुलबन्धुषु । अलाभे त्वन्यगेहानां पूर्वं पूर्वं विवर्जयेत् ॥
वह न तो अपने गुरू के कुटुम्बियों से भीख मांगे, और न अपनों से और न अपनी माता के रक्‍त-संबंधियों से। परन्तु यदि परदेशियों का कोई घर न हो, तो वह ऊपर लिखे हुए में से किसी एक के पास जाए, और अन्तिम नाम वाले को पहिले ले।
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