एकः शयीत सर्वत्र न रेतः स्कन्दयेत् क्व चित् ।
कामाद् हि स्कन्दयन् रेतो हिनस्ति व्रतमात्मनः ॥
उसे हमेशा अकेला सोने दो, उसे अपना पुरुषत्व कभी बर्बाद नहीं करने दो; क्योंकि जो स्वेच्छा से अपने पुरुषत्व को नष्ट करता है, वह अपनी मन्नत तोड़ देता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।