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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 167
आ हैव स नखाग्रेभ्यः परमं तप्यते तपः । यः स्रग्व्यपि द्विजोऽधीते स्वाध्यायं शक्तितोऽन्वहम् ॥
ऐसा कहा जाता है कि द्विज व्यक्ति, जो माला धारण करने पर भी अपनी क्षमता के अनुसार प्रतिदिन वेदों का पाठ करता है, अपने नखों की नोक तक सर्वोच्च तपस्या करता है।
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