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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 157
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति ॥
जैसे लकड़ी से बना हाथी, चमड़े से बना हिरण, वैसे ही अशिक्षित ब्राह्मण - ये तीनों केवल अपने नाम धारण करते हैं।
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