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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 113
विद्ययैव समं कामं मर्तव्यं ब्रह्मवादिना । आपद्यपि हि घोरायां न त्वेनामिरिणे वपेत् ॥
वेद के प्रतिपादक अपने ज्ञान के साथ-साथ नष्ट हो सकते हैं; परन्तु संकट में भी उसे कभी बंजर भूमि में नहीं बोना चाहिए।
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