धर्मार्थौ यत्र न स्यातां शुश्रूषा वाऽपि तद्विधा ।
तत्र विद्या न वप्तव्या शुभं बीजमिवौषरे ॥
जहां पुण्य और धन संभव न हो, सेवा करने की पर्याप्त इच्छा न हो, वहां ज्ञान नहीं देना चाहिए; जिस प्रकार बंजर भूमि में स्वस्थ बीज नहीं बोया जाता।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।