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मनुस्मृति • अध्याय 2 • श्लोक 104
अपां समीपे नियतो नैत्यकं विधिमास्थितः । सावित्रीमप्यधीयीत गत्वाऽरण्यं समाहितः ॥
जो (इच्छा) दैनिक (पाठ) समारोह (की) करता है, वह पानी के पास सावित्री का पाठ भी कर सकता है, जंगल में सेवानिवृत्त हो सकता है, अपने अंगों को नियंत्रित कर सकता है और अपने मन को एकाग्र कर सकता है।
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