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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 98
सुवर्णस्तेयकृद्विप्रो राजानमभिगम्य तु। स्वकर्म ख्यापयन्‌ ब्रूयान्मां भवाननुशास्त्विति ।।
(ब्राह्मण का) सुवर्ण चुराने वाला ब्राह्मण अपने अपराध को कहता हुआ राजा के पास जाकर कहे कि आप मुझे दण्डित करें।
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