(महर्षियों से भृगुजी कहते हैं कि) यह (११।८९-९६) सुरा पीने की शुद्धि (मैने) कही, अब इसके आगे (११।९८-१००) सोना चुराने की शुद्धि (प्रायश्चित्त) को मैं कहूंगा।
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