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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 97
एषा विचित्राऽभिहिता सुरापानस्य निष्कृतिः । अत उर्ध्व प्रवक्ष्यामि सुवर्णस्तेयनिष्कृतिम्‌ ।।
(महर्षियों से भृगुजी कहते हैं कि) यह (११।८९-९६) सुरा पीने की शुद्धि (मैने) कही, अब इसके आगे (११।९८-१००) सोना चुराने की शुद्धि (प्रायश्चित्त) को मैं कहूंगा।
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