यस्य कायगतं ब्रह्म मद्येनाप्लाव्यते सकृत् ।
तस्य व्यपैति ब्राह्मण्यं शूद्रत्वं च स गच्छति ।।
जिस ब्राह्मण का शरीरस्थ ब्रह्म (वेद-संस्कार रूप से अवस्थित एक इशरीर होने से जीवात्मा) एक बार भी मद्य से आप्लावित होता है अर्थात् जो ब्राह्मण एक बार भी मद्य पीता है, तो उसका ब्राह्मणत्व नष्ट हो जाता है तथा वह शूद्रत्व को प्राप्त करता है।
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