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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 91
कणान्वा भक्षयेदब्दं पिण्याकं वा सकृन्निशि । सुरापानापनुत्यर्थं वालवासा जटी ध्वजी ।।
अथवा बाल से बने वस्त्र को पहनता हुआ; जटाधारण करता हुआ और सूरापात्र के चिहण को धारण करता हुआ मदिरा पीने वाला मनुष्य पीने के दोष से छूटने के लिए एक वर्ष तक कण (अन्न की चुन्नी खुद्दी) या खली को रात में एक बार खावे।
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