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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 89
सुरां पीत्वा द्विजो मोहादग्निवर्णा सुरां पिबेत्‌ । तया स काये निर्दग्धे मुच्यते किल्बिषात्ततः ।।
द्विज मोहवश मदिरा को पीकर अग्नि के समान गर्म मदिरा को पीवे, उस (अग्नि के समान जलती हुई मदिरा) से शरीर अर्थात्‌ मुख के जलने (के कारण मर जाने) पर मनुष्य उस (मदिरा पीने से उत्पन्न पाप) से छूट जाता है।
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