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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 86
हत्वा गर्भमविज्ञातमेतदेव व्रतं चरेत्‌ । राजन्यवैश्यौ चेजानावात्रेयीमेव च स्त्रियम्‌ ।।
अज्ञात (स्त्री-पुरुष या नपुंसक का ज्ञान रहित) गर्भ, यज्ञ करते हुए क्षत्रिय तथा वैश्य और आत्रेयी की हत्या करके (इसी बाह्यहत्या के) प्रायश्चित्त को करे।
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