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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 81
शिष्ट्वा वा भूमिदेवानां नरदेवसमागमे । स्वमेनोऽ वभृथस्नातो हयमेधे विमुच्यते ।।
अथवा अश्वमेध यज्ञ में ब्राह्मणों तथा राजाओं के समागम (एकत्रित) होने पर अपने पाप को (“मैने ब्रह्महत्या की है" इस प्रकार) बतलाकर अवभृथ (यज्ञ समाप्ति के बाद किया जानेवाला) स्नान करके (ब्रह्महत्या करनेवाला उस) पाप से छूट जाता है।
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