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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 8
शक्तः परजने दाता स्वजने दुःखजीविनि । मध्वापातो विषास्वादः स धर्मप्रतिरूपकः ।।
दान देने में समर्थ जो मनुष्य अपने परिवार वालों के दुःखित रहने पर (अपने यश तथा प्रसिद्धि के लिए) दान देता है वह (समाज में यश एवं प्रसिद्धि होने में) पहले मधु (शहर) के समान मीठा और बाद में (परिवार वालों के दुःखित होने के कारण नरक पाने से) विष के समान कटु धर्म का पाखण्डी है (अतएव ऐसे दान को नहीं करना चाहिए।)
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