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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 79
त्र्यवरं प्रतिरोद्धा वा सर्वस्वमवजित्य वा । विप्रस्य तन्निमित्ते वा प्राणालाभेऽपि मुच्यते ।।
ब्राह्मण-धन के चुराने वालों से निष्कपट तथा यथाशक्ति तीन बार उस धन को छुड़ाने का प्रयत्न करने पर या एक दो बार में ही उन चोरों को जीतकर उस चोरित धन को उसके स्वामी ब्राह्मण के लिए देने पर, अथवा चुराये हुए धन के बराबर अपना धन देकर उस ब्राह्मण की प्राणरक्षा करने से वह ब्रह्महत्या के दोष से छूट जाता है।
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