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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 78
ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा सम्यक्‌ प्राणान्परित्यजेत्‌ । मुच्यते ब्रह्महत्याया गोप्ता गोर्ब्राह्मणस्य च ।।
(पूर्व ११।७१ या ७७) वचनानुसार किसी स्थान में रहकर बारह वर्ष तक प्रायश्चित्त करने का नियम लिया हुआ ब्रह्मघातीमनुष्य (अग्नि, व्याघ्र आदि हिंसक या जल आदि से आक्रान्त) ब्राह्मण या गौ (की रक्षा) के लिए तत्काल प्राणों को छोड़ दे, अथवा उनके रक्षार्थ प्राणपण से चेष्टा करता हुआ वह मनुष्य जीकर भी बारह (या अपने वर्ण के अनुसार नियत) वर्ष के समाप्त नहीं होने पर (वह ब्राह्मण-रक्षक) ब्रह्महत्या के दोष से छूट जाता है।
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