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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 74
जपन्वान्यतमं वेदं योजनानां शतं ब्रजेत्‌ । ग्रह्महत्यापनोदाय मितभुङ्नियतेन्द्रियः ।।
अथवा स्वल्पाहार करता हुआ जितेन्द्रिय होकर किसी एक वेद को जपता हुआ ब्रह्महत्या (के दोष) के विनाश के लिए सौ योजन (४०० कोश) तक गमन करे।
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