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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 71
ब्रह्महा द्वादशसमाः कुटीं कृत्वा वने वसेत्‌ । भैक्षाश्यात्मविशुद्धयर्थ कृत्वा शवशिरोध्वजम्‌ ।।
ब्राह्मण का वध करने वाला मनुष्य अपने पाप की शुद्धि (निवृत्ति) के लिये कुटिया बनाकर उस (मृत-ब्राह्मण के साथ नहीं मिलने पर दूसरे किसी) के शिर को चिह्न स्वरूप लेकर भिक्षान्न के भोजन को करता हुआ (अग्रिम (१ १।७७) वचन के अनुसार मुण्डित मस्तक होकर) बारह वर्षो तक वन में निवास करे।
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