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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 68
निन्दितेभ्यो धनादानं वाणिज्यं शूद्रसेवनम्‌ । अपात्रीकरणं ज्ञेयमसत्यस्य च भाषणम्‌ ।।
जिससे दान नहीं लेना चाहिये, उससे दान लेना, व्यापार, शूद्र की सेवा और असत्य बोलना (प्रत्येक) मनुष्य को अपात्र करने वाले हैं।
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