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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 66
ब्राह्मणस्य रुजःकृत्यं घ्रातिरघ्रेयमद्ययोः । जैहांच च मैथुनं पुंसि जातिभ्रंशकरं स्मृतम्‌ ।।
ब्राह्मण को (दण्डा या थप्पड़ आदि से) पीड़ित करना (मारना), नहीं सूँघने योग्य (लहसुन, प्याज, विष्ठा आदि) वस्तु तथा मद्य को सुँघना, कुटिलता और (गुदा या मुख में) मैथुन करना - ये (प्रत्येक कर्म) मनुष्य को जातिभ्रष्ट करने वाले हैं।
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