व्रात्यता बान्धवत्यागो भृत्याध्यापनमेव च ।
भृताच्चाध्ययनादानमपण्यानां च विक्रयः ।।
व्रात्यमाव (२।३९), (चाचा-ताऊ आदि) बान्धवों का त्याग (उनके अनुकूल नहीं रहना), वेतन लेकर पढ़ाना, वेतन देकर पढ़ना अविक्रेय (नहीं बेचने योग्य) सौदों को बेचना।
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