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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 58
गोवधोऽ याज्यसंयाज्यं पारदार्यात्मविक्रयाः । गुरुमातृपितृत्यागः स्वाध्यायारन्योः सुतस्य च ।।
गोवध, अयाज्य-याजन, परस्त्री-गमन, आत्मविक्रय; गुरु, माता और पिता का त्याग अर्थात्‌ उनकी सेवा-शुश्रूषा नहीं करना; ब्रह्मयज्ञ (वेदाध्ययन); स्मार्त अग्नि और पुत्रक त्याग (पुत्र को संस्कृत तथा भूषणादि से अलङ्कृत नहीं करना)।
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