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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 55
ब्रह्योज्झता वेदनिन्दा कौटसाक्ष्यं सुहृद्दध: । गर्हितानाद्ययोर्जग्धिः सुरापानसमानि षट्‌ ।।
पढ़े हुए वेद का (अभ्यास नहीं करने से) विस्मरण, (असत्‌ शास्त्र का आश्रयकर) वेद की निन्दा करना, गवाही में असत्य कहना, (अब्राह्मण भी) मित्र की हत्या, निन्दित (लहसुन, प्याज आदि) तथा अभक्ष्य (मल = मूत्रादि) पदार्थो का भोजन - ये ६ पद्यपान के समान हैं।
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