(प्रायश्चत्त के द्वारा) पापनाश नहीं किए हुए मनुष्य (११।४८-५०) निन्द्य लक्षणों से युक्त होते हैं, अतएव पाप-निवृत्ति के लिए प्रायश्चित्त करना चाहिये।
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