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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 46
प्रायश्चित्तीयतां प्राप्य दैवात्पूर्वकृतेन वा । न संसर्ग व्रजेत्सद्भिः प्रायश्चित्तेऽ कृते द्विजः ।।
भाग्यवश (या प्रमादवश) पूर्वजन्मकृत पापों से प्रायश्चित्त के योग्य द्विज बिना प्रायश्चित किये सज्जनों के साथ (याजन-यजनादि) सम्बन्ध न करे।
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