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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 45
अकामतः कृतं पापं वेदाभ्यासेन शुद्ध्यति । कामतस्तु कृतं मोहात्प्रायश्चित्तैः पृथग्विधैः ।।
अनिच्छापूर्वक किया गया पाप वेदाभ्यास से नष्ट हो जाता है तथा रागद्वेषादि मोहवश इच्छापूर्वक किया गया पाप अनेक प्रकार के प्रायश्चित्तो से नष्ट होता है।
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