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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 44
अकामतः कृते पापे प्रायश्चित्तं विदुर्बुधाः । कामकारकृतेऽप्याहुरेके श्रुतिनिदर्शनात्‌ ।।
कुछ पण्डित लोग अज्ञान से किये गये पाप में प्रायश्चित्त करने को कहते हैं और कुछ आचार्य ज्ञान से किये गये पाप में भी श्रुति को देखने से प्रायश्चित्त करने को कहते हैं।
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