अकुर्वन्विहितं कर्म निंदितं च समाचरन् ।
प्रसञ्जन्निन्द्रियार्थेषु प्रायश्चित्तीयते नरः ।।
शास्त्रोक्त कर्म (नित्य सन्ध्योपासन, शवस्पर्श करने पर स्नान आदि) को नहीं करता हुआ तथा शास्त्रप्रतिषिद्ध कर्म (हिंसा, चोरी, मद्यपान, द्यूत आदि) को करता हुआ और इन्द्रियों के विषयों में अत्यन्त आसक्त होता हुआ मनुष्य प्रायश्चित्त करने के योग्य होता है।
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