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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 41
ये शूद्रादधिगम्यार्थमग्निहोत्रमुपासते । ऋत्विजस्ते हि शूद्राणां ब्रह्मवादिषु गर्हिताः ।।
जो शूद्र से धन लेकर अग्निहोत्र करता है, वह शूद्र का ही याजक (शूद्र को यज्ञ कराने वाला हे अर्थात्‌ उस यज्ञ का फल अग्निहोत्र करने वाले को नहीं मिलता) है और वह वेदपाठियों में निन्दित होता है।
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