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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 32
श्रुतीरथर्वाङ्गिरसीः कुर्यादित्यविचारयन्‌ । वाकशस्र वै ब्राह्मणस्य तेन हन्यादरीन्द्रिजः ।।
ब्राह्मण अपने वेद के आङ्गिरस श्रुति (दुष्ट मन्त्रों) को बिना विचारे ही (शीघ्र ही, शत्रु पर) प्रयोग करे; क्योंकि ब्राह्मण का (अभिचारमन्त्रोच्चारणरूप) वचन ही शस्त्र है, अतएव उस (वचनरूपी शस्त्र) से ब्राह्मण शत्रुओं को नष्ट करे (राजा के यहाँ उसके अपराध को कहकर दण्डित न करावे, किन्तु अभिचार प्रयोग से उसे स्वयं दण्डित करे)।
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