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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 29
प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पेन वर्तते । न सांपरायिकं तस्य दुर्मतेर्विद्यते फलम्‌ ।।
जो मनुष्य मुख्य यज्ञ को करने में समर्थ होकर भी अनुकल्प (मुख्य का प्रतिनिधि) आपत्तिकाल के लिए सम्मत अप्रधान पक्ष से यज्ञ को करता है, उस दुर्बुद्धि को पारलौकिक वृद्धि तथा पापनाशरूप फल प्राप्त नहीं होता।
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