विश्वेदेव, साध्यगण (देवयोनि विशेष) और महर्षि ब्राह्मणों ने मृत्यु से डरकर आपत्तिकाल में विधि (शास्त्रोक्त प्रधान विधि सोमयज्ञादि) के प्रतिनिधि (वैश्वानर यज्ञ आदि) को किया है (अत: समर्थ नहीं होने पर ही मुख्य विधि सोमयज्ञादि को छोड़कर उसके प्रतिनिधि वैश्वानर यज्ञादि को करना चाहिये)।
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