आपत्कल्पेन यो धर्म कुरुतेऽनापदि द्विजः ।
स नाप्नोति फलं तस्य परत्रेति विचारितम् ।।
जो द्विज आपत्तिकाल के नहीं रहने पर भी आपत्तिकाल के विधान से धर्म (यज्ञादि कर्म) करता है, वह (मरकर) परलोक में उस यज्ञ के फल को नहीं पाता है अर्थात् उसका वह यज्ञ करना निष्फल होता है, ऐसा (मनु आदि महर्षियों ने) कहा है।
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