यथा ममाहुदं प्राप्य क्षिप्तं लोष्टं विनश्यति ।
तथा दुश्चरितं सर्व वेदे त्रिवृति मज्जति ।।
जिस प्रकार महाहृद (बड़े जलाशय) में गिरा हुआ (मिट्टी का) ढेला (पिघलकर) नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार त्रिवृत्’ (११।२६३) वेद में सब नष्ट हो जाते हैं।
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