वर्ष (संवत्) के बदलने के समय अर्थात् चैत्र शुक्ल के आरम्भ में शास्त्रविहित सोमयज्ञ को नहीं कर सकने पर उसके दोष की शान्ति के लिए (शूद्रादि से धन लेकर भी) वैश्वानर यज्ञ करना चाहिए।
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