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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 26
इष्टिं वैश्वानरी नित्यं निर्वपेदव्दपर्यये । क्लप्तानां पशुसोमानां निष्कृत्यर्थमसम्भवे ।।
वर्ष (संवत्‌) के बदलने के समय अर्थात्‌ चैत्र शुक्ल के आरम्भ में शास्त्रविहित सोमयज्ञ को नहीं कर सकने पर उसके दोष की शान्ति के लिए (शूद्रादि से धन लेकर भी) वैश्वानर यज्ञ करना चाहिए।
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