महापातक (ब्रह्महत्या-११।५३) से युक्त मनुष्य जितेन्द्रिय होकर एक वर्ष तक गौओं के पीछे-पीछे चलते (११।१०७-११३ के अनुसार उनकी सेवा करते) हुए भिक्षान्न का भोजन करने से तथा “पावमानी (यः पावमानीरध्येति इत्यादि)" ऋचाओं का प्रतिदिन अभ्यास (जप) करने से शुद्ध (पापरहित-निरदोष) हो जाता है।
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