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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 254
अब्दार्थमिन्द्रमित्येतदेनस्वी सप्तकं जपेत्‌ । अप्रशस्तं तु कृत्वाऽप्सु मासमासीत भैक्षभुक्‌ ।।
पापी (किसी पाप-विशेष का उल्लेख नहीं होने से सर्वविध पाप को करनेवाला) मनुष्य 'इन्द्र' (इन्दं मित्रं वरुणमग्निम्‌) इत्यादि सात ऋचाओं को ६ मास तक प्रति-दिन जप. करे तथा जल में मल-मूत्र का त्यागकर एक मासतक भिक्षा माँगकर भोजन करे।
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