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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 252
प्रतिगृह्याप्रतिग्राह्रा भुक्त्वा चान्नं विगर्हितम्‌ । जपंस्तरत्समंदीयं पूयते मानवरूयहात्‌ ।।
अग्राह्म दान लेकर तथा अभक्ष्य का भक्षणकर मनुष्य 'तरत्समन्दीयं तरत्समन्दी धावति’ इन चार ऋचाओं को तीन दिन तक जपकर उस पाप से छूट जाता है।
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