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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 250
हविष्यान्तीयमभ्यस्य न तमं ह इतीति च । जपित्वा पौरुषं सूक्तं मुच्यते गुरुतल्पगः ।।
'हविष्पान्तीय' (हविष्पान्तमजरं स्वर्विदि) इत्यादि उन्नीस ऋचाओं को 'नममंह' (नतमंहो न दुरितम्‌) इत्यादि आठ ऋचाओं को, 'इति' (इति वा इति मे मन:' तथा 'शिवसङ्कल्पमस्तु' यह सूक्त द्वय) और पुरुषसूक्त (सहस्र शीर्षापुरुषः' आदि १६ मन्त्र) शीर्षापुरुषः' आदि १६ मन्त्र) को एक मास तक प्रतिदिन (१६-१६ बार) जपकर गुरुपत्नी के साथ सम्भोग करने वाला पाप से छूट जाता है।
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