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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 249
सकृज्जप्त्वाऽस्य वामीयं शिवसङ्कल्पमेव च । अपहृत्य सुवर्ण तु क्षणाद्धवति निर्मलः ।।
सुवर्ण को चुराने वाला ब्राह्मण “अस्त वामीय" “अस्य वामस्य पलितस्य” इस सूक्त को और वाजसनेयक में पठित “यज्जाग्रतो दूरमुदैति......." इस शिवसङ्कल्प को एक बार भी (एक मास तक) जपकर तत्काल दोषरहित हो जाता है।
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