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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 248
कौत्सं जप्त्वाप इत्येतद्वासिष्ठं च प्रतीत्यूचम्‌ । माहित्रं शुद्धवत्यश्च सुरापोऽपि विशुध्यति ।।
कौत्स ऋषि से देखा गया “अप न शोशुचदधम्‌" यह सूक्त, वसिष्ठ ऋषि से देखा गया प्रतिस्तोमेभिरुषसं वसिष्ठा यह ऋचा, माहित्र “माहित्रीणामवोऽस्तु' सूक्त तथा शुद्धवती 'एतोन्विन्द्रं स्तवाम शुद्धम्‌’ इन तीन ऋचाओं को प्रतिदिन १६-१६ बार (एक मास तक) जपकर मदिरा पीने वाला भी ('अपि' शब्द से आतिदेशिक मदिरापान के प्रायश्चित्त का अधिकारी भी) शुद्ध हो जाता है।
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